बहराइच। गोवंश वध और अवैध हथियार से जुड़े एक मामले में दर्ज FIR को लेकर Allahabad High Court ने बहराइच पुलिस पर सख्त टिप्पणियाँ की हैं। अदालत ने कहा कि FIR की भाषा और घटनाक्रम का वर्णन “फिल्मी पटकथा” जैसा प्रतीत होता है और इसमें समय-संबंधी गंभीर विसंगतियाँ दिखती हैं। कोर्ट ने बहराइच के पुलिस अधीक्षक (SP) से व्यक्तिगत शपथपत्र दाखिल कर स्पष्टीकरण देने को कहा है।
![]() |
| फोटो सोर्स: AI Generated |
क्या है मामला?
थाना जरवल रोड, जिला बहराइच में 22 जनवरी 2026 को दर्ज FIR में आरोप है कि पुलिस टीम को मुखबिर से सूचना मिली, जंगल में घेराबंदी हुई, फायरिंग हुई और एक आरोपी के पैर में गोली लगी। मौके से 315 बोर का तमंचा, कारतूस और लगभग 25 किलो मांस बरामद दिखाया गया। धाराएँ Arms Act 1959, Uttar Pradesh Prevention of Cow Slaughter Act 1955 और Bharatiya Nyaya Sanhita 2023 के तहत मामला दर्ज है।
अदालत ने किन बिंदुओं पर उठाए सवाल?
“उजाला होने वाला है” बनाम 10:45 बजे का समय
FIR में घटना का समय 10:45 बजे दर्शाया गया है, जबकि कथित संवाद में “उजाला होने वाला है” जैसी पंक्ति दर्ज है। जनवरी में सुबह का उजाला काफी पहले हो जाता है—ऐसे में 10:45 बजे “उजाला होने वाला है” कैसे?
घटना और गिरफ्तारी एक ही समय?
FIR में घटना का समय और गिरफ्तारी का समय दोनों 10:45 बजे दिखाए गए हैं। अदालत ने संकेत दिया कि घेराबंदी, फायरिंग, तलाशी, बरामदगी और गिरफ्तारी—ये सब एक ही समय में कैसे संभव है?
संवाद-प्रधान, नाटकीय भाषा
FIR में विस्तृत संवाद और नाटकीय वर्णन दर्ज है। कोर्ट ने कहा कि FIR का उद्देश्य तथ्यात्मक सूचना देना होता है, न कि कहानी जैसा विवरण। SP से शपथपत्र, तब तक राहत
हाईकोर्ट ने SP से दो सप्ताह में व्यक्तिगत शपथपत्र दाखिल कर विसंगतियों का जवाब देने को कहा है। अगली सुनवाई तक कठोर कार्रवाई (coercive action) पर रोक का निर्देश भी दिया गया है, ताकि अदालत के समक्ष तथ्य स्पष्ट हो सकें।कानूनी असर क्या हो सकता है? कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार:
समय-रेखा (timeline) में विरोधाभास FIR की विश्वसनीयता पर प्रश्न खड़े कर सकता है। यदि शपथपत्र में संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं मिलता, तो अदालत जांच की निगरानी या अन्य उपयुक्त आदेश दे सकती है। बचाव पक्ष इन बिंदुओं को जमानत या अन्य राहत के लिए आधार बना सकता है।
निष्कर्ष:
यह मामला केवल एक FIR की भाषा का नहीं, बल्कि आपराधिक न्याय-प्रक्रिया की पारदर्शिता और विश्वसनीयता का भी है। हाईकोर्ट की सख्ती ने साफ संकेत दिया है कि तथ्यात्मक सटीकता और प्रक्रियात्मक शुचिता से कोई समझौता स्वीकार्य नहीं होगा। अगली सुनवाई में SP के शपथपत्र पर सबकी निगाहें रहेंगी।

